130-140 दिन में पकने वाली धान की प्रजातियों जैसे पन्त 12, पन्त धान-4 और सरजू-52 आदि की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक अवश्य कर लेनी चाहिए,
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| Dhan Ki Ropai |
अन्यथा उसके बाद उपज में निरन्तर कमी होने लगती है। यह कमी 30-40 किग्रा० प्रतिदिन प्रति हेक्टर होती है। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों जैसे साकेत-4, प्रसाद, गोविन्द, मनहर पंत-10, आई०आर-36 आदि की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है। देर से पकने वाली प्रजातियां जैसे क्रांस-116, टा-100,टा-22, तथा सुगन्धित धान जैसे टा-3, एन-12 आदि की रोपाई जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जानी चाहिए। अधिक उपज देने वाली सुगन्धित किस्में जैसे पूसा बासमती-1 की रोपाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए। क्वारी और कार्तिकी धान की बौनी प्रजातियों को 21-25 दिन की पौध की रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। देशी तथा देर से पकने वाली प्रजातियों को 30-35 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। ऊसर में रोपार्इ हेतु 35 दिन की पौध का प्रयोग करें तथा एक स्थान पर 2 से 3 पौधे लगायें तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 सेमी० रखी जाय। शीघ्र मध्यम एवं विलम्ब से पकने वाली प्रजातियों की नर्सरी की रोपाई विषम परिस्थितियों में क्रमशः 30-35, 40-45 एवं 50-55 दिनों में की जा सकती है। स्वर्णा, सोना महसूरी व महसूरी की मई के अन्त से 15 जून तक रोपाई कर देनी चाहिए। विलम्ब से रोपाई करने से फूल आने में कठिनाई होती है।
उचित गहराई व दूरी पर रोपाई
बौनी प्रजातियों की पौध की रोपाई 3-4 सेमी० से अधिक गहराई पर नहीं करना चाहिए। अन्यथा कल्ले कम निकलते है और उपज कम हो जाती है। साधारण उर्वरा भूमि में पंक्तियों व पौधों की दूरी 20×10 सेमी० उर्वरा भूमि में 20×15 सेमी० रखें। एक स्थान पर 2-3 पौध लगाने चाहिए। यदि रोपाई में देर हो जाय तो एक स्थान पर 3-4 पौध लगाना उचित होगा। साथ ही पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 5 सेमी० कम कर देनी चाहिए। इस बात पर विशेष ध्यान दें कि प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफल में सामान्य स्थिति में 50 हिल अवश्य होना चाहिए ऊसर तथा देर से रोपाई की स्थिति में 65-70 हिल होनी चाहिए।
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